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एमएसपी कानून बनाया तो कंगाल हो जाएंगी सरकारें - प्रदीप मांढरे

यह व्यवहारिक सत्य है कि किसानों का सब्सिडी  से भला नहीं हुआ है। किसानों के बैंक खाते में आई सालाना सरकारी मदद भी उनकी माली दशा सुधार नहीं सकी है। सिर्फ एमएसपी कानून ही भारत के आम किसान की दुर्दशा संवार सकता है। साथ ही यह भी कटु सत्य है कि एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइज कानून बनाया गया और उसे लागू किया गया तो केन्द्र और राज्य सरकारें कंगाल हो जाएंगी।

इसे यूं समझें कि अभी जब यह कानून नहीं है, देश के 6-7 फीसदी किसान ही एमएसपी का लाभ ले पाते हैं। हालांकि पंजाब, हरियाणा के 80 फीसदी किसान एमएसपी दरों पर अपनी फसल बेचने में सफल हो रहे हैं। इसलिए वहां के किसान ज्यादा समृध्द हैं। वहां के किसानों को अंदेशा हुआ कि आगे जाकर एमएसपी बंद हो जाएगी, क्योंकि तीनों कृषि कानूनों में इसका प्रावधान नहीं है, इसलिए वे एक साल से धरना  दे रहे हैं। अब उन्होंने एमएसपी को कानून का रूप देने की मांग तेज कर दी है।  यह ऐसा मुद्दा है, जो  देश के ज्यादातर किसान  को आकर्षित कर रहा है। सभी राज्यों के किसानों को समझ में आ गया कि एमएसपी  कानून उनके हक में है, तो वे अपने-अपने क्षेत्र में भी वेैसा ही धरना, प्रदर्शन शुरू कर सकते हैं और सरकार पर दबाव डाल सकते हैं, जैसा धरना दिल्ली बार्डर पर पंजाब, हरियाणा, वेस्टर्न यूपी के किसान दे रहे हैं। वर्ष 2022, 2023, 2024 में चुनाव ही चुनाव हैं, इसलिए केन्द्र की भाजपा सरकार को एमएसपी का मुद्दा गरमाने पर अपना किसान वोट बैंक खिसकने की आशंका है। मान लीजिए केन्द्र सरकार एमएसपी पर कानून बनाती है तो सबसे बड़ा सवाल  यह उठेगा कि केन्द्र  व राज्य सरकारों  के पास किसानों की फसलें एमएसपी दर पर खरीदने के लिए पैसा कहां से आएगा? क्योंकि तब कम से कम 50 फीसदी किसान एमएसपी की दर पर अपनी फसल बेच सकेंगे। अभी 14 खरीब की फसलें और 6 रबी की फसलें एमएसपी के दायरे में आती हैं। एमएसपी कानून बनने पर अन्य फसलें उगाने वाले किसान भी अपनी फसलों को एमएसपी के दायरे में लाने की मांग करेंगे। वर्तमान में व्यवस्था यह है कि राज्य सरकारें एमएसपी की दर पर जितनी भी फसल खरीदती हैं, उसका पैसा केन्द्र बाद में देता है। कई बार यह पैसा बहुत समय बाद मिलता है। एमएसपी लागू होते ही सभी सरकारों की अर्थव्यवस्था चरमराने लगेगी। क्योंकि सरकारी मशीनरी पर बहुत बोझ बढ़ जाएगा। जेैसे फसल खरीदना, उसे गोदामों तक पहुंचाना  इत्यादि। अभी 6-7 फीसदी किसानों का गेहूं , धान, सरसों व अन्य फसले खरीदने के लिए  ही सरकारों के पास पर्याप्त गोदाम नहीं हैं और सरकारी मण्डियों मेें पर्याप्त साधन नहीं हैं।हम और आप हर साल देखते रहे हैं, पढ़ते रहे हैं  कि किसानों से खरीदा गया अनाज बरसात में भीग जाता है और गोदामों में सड़ जाता है। यदि एमएसपी कानून बन गया तो देश के किसानों की फसल रखने के लिए गोदाम कहां से आएंगे? और सरकारों के पास किसानों को देने के लिए अरबों रूपया कहां से आएगा? वर्तमान व्यवस्था में सरकार जो फसल खरीदती है उसे बेच नहीं पाती है। सरकारों के पास जरूरत से ज्यादा अनाज है, यही कारण है कि वह गरीबों को मुफ्त या 1 रूपये किलो बांट रही है औेर सड़े हुए गेहूं को शराब कम्पनियों को बेच रही है। सोचिए कि एमएसपी कानून बनने पर कितने बुरे हालात हो जाएंगे? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)