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स्वर-स्मृति में भीगी ग्वालियर की संध्या, रागायन सभा में डॉ प्रभाकर लक्ष्मण गोहदकर को भावभीनी स्वरांजली

ग्वालियर। ग्वालियर की सांगीतिक परंपरा ने एक बार फिर अपने गौरवशाली स्वरूप का साक्ष्य दिया, जब प्रतिष्ठित संस्था रागायन की संगीत सभा में ग्वालियर घराने के मूर्धन्य गायक डॉ प्रभाकर लक्ष्मण गोहदकर को श्रद्धा-सिक्त स्वरांजलि अर्पित की गई। सिद्धपीठ श्री गंगादास जी की बड़ी शाला में सजी यह सुरमयी संध्या केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्मृतियों, साधना और समर्पण का जीवंत उत्सव बन गई—जहाँ हर स्वर में गुरु-ऋण की विनम्र अभिव्यक्ति झलक रही थी। कार्यक्रम का शुभारंभ गरिमामयी वातावरण में हुआ। रागायन के अध्यक्ष एवं पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी रामसेवक दास जी महाराज तथा राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलगुरु, जो स्वयं डॉ गोहदकर की सुपुत्री भी हैं, ने माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर तथा गुरु-पूजन कर इस संगीत-यज्ञ की शुरुआत की। उपस्थित जनों ने भावभीने मन से डॉ गोहदकर के चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया।

◆ राग मधुवंती में सजी साधना की मधुर छाया

सांगीतिक प्रस्तुतियों की प्रथम कड़ी में ग्वालियर की वरिष्ठ गायिका एवं कमलाराजे गर्ल्स कॉलेज की प्राध्यापिका डॉ सपना मराठे ने राग मधुवंती से वातावरण को सुरमय किया। उनके कंठ से निकले स्वरों में संतुलित माधुर्य और साधना का ठहराव स्पष्ट अनुभूत हुआ। विलंबित, मध्य और द्रुत तीनों लयों में प्रस्तुत बंदिशों ने राग की विविध छवियों को उकेरा। “ऐ लाल के नैना”, “माने मनाए नाहीं” और “कैसे जाऊँ री सखी पनघटवा” के भावपूर्ण प्रस्तुतीकरण ने श्रोताओं को राग की सूक्ष्मताओं से जोड़ दिया। अंत में मीराबाई के भजन “दरस बिन दुखन लगे नैन” ने भक्ति और विरह की कोमल संवेदना से सभा को आलोकित कर दिया। तबले पर सुजल जैन और हारमोनियम पर अक्षत मिश्रा की संगत ने प्रस्तुति को सशक्त आधार प्रदान किया।

◆ सितार के सुरों में जोग का गहन विस्तार

द्वितीय प्रस्तुति में ग्वालियर घराने के प्रख्यात सितारवादक पंडित श्रीराम उमड़ेकर ने राग जोग के माध्यम से वादन की गरिमा को स्थापित किया। उनकी उंगलियों से झरते स्वरों ने राग की गहराई और विस्तार को सजीव कर दिया। विलंबित और द्रुत गतों में निबद्ध यह प्रस्तुति लयकारी और रागदारी का अद्भुत समन्वय थी। तबले पर संजय राठौर की सधी हुई संगत ने वादन को और अधिक प्रभावी बना दिया, मानो सुर और ताल का साक्षात संवाद चल रहा हो।

◆ बागेश्री में खिला भाव और माधुर्य का विस्तार

कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति इंदौर से पधारी विख्यात गायिका श्रीमती स्मिता दामले मोकाशी के खयाल गायन की रही। राग बागेश्री में उनके स्वर जैसे धीरे-धीरे खिलते पुष्प की तरह विकसित होते गए। “सखी मन लागे न”, “जो हमने तुमसे बात कही” और “वेग वेग आओ भी” जैसी बंदिशों के माध्यम से उन्होंने राग की भाव-संपन्नता को अत्यंत सलीके से अभिव्यक्त किया। उनके आलाप, तानों और विस्तार में एक परिपक्व साधना की छाप स्पष्ट थी, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। तबले पर पांडुरंग तैलंग और हारमोनियम पर विवेक जैन की संगत ने प्रस्तुति में प्राण-तत्व भर दिया।

◆ सुरों में जीवित रही स्मृति, साधना और संस्कार

पूरी संध्या में सुरों का प्रवाह जैसे स्मृतियों की नदी बनकर बहता रहा। हर प्रस्तुति, हर बंदिश, हर आलाप डॉ गोहदकर की साधना और उनके सांगीतिक अवदान को नमन करता प्रतीत हुआ।

कार्यक्रम का संचालन अशोक आनंद ने सहज और सुरुचिपूर्ण ढंग से किया, जबकि आभार प्रदर्शन रागायन के उपाध्यक्ष श्री अनंत महाजन ने व्यक्त किया। यह संध्या केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि ग्वालियर घराने की जीवंत परंपरा का पुनर्स्मरण थी, जहाँ गुरु की स्मृति सुरों में धड़कती रही और संगीत, साधना का पर्याय बनकर उपस्थित रहा।



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